विरोध प्रदर्शनों की रील वायरल होने के बाद पत्रकारों की पहचान तय करने पर विचार कर रही सरकार
डिजिटल पत्रकारों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए मानक तय करने पर मंथन, मान्यता देने के नियमों में हो सकता है बदलाव
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली और अन्य स्थानों पर पिछले तीन महीनों के दौरान हुए Gen Z विरोध प्रदर्शनों से जुड़े वीडियो और रील्स सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने के बाद सरकार पत्रकारों की पहचान और उनकी मान्यता के मानक तय करने पर विचार कर रही है। *द इंडियन एक्सप्रेस* की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार डिजिटल पत्रकारों और खुद को पत्रकार बताने वाले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए कुछ मापदंड निर्धारित करने पर विचार कर रही है। हालांकि, इस संबंध में चर्चा अभी शुरुआती चरण में है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में NEET-UG पेपर लीक के विरोध में कॉकroach जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के दौरान बड़ी संख्या में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने विरोध स्थलों से वीडियो बनाए। इन वीडियो में प्रदर्शनकारियों के नारे, पुलिस की कार्रवाई और विरोध प्रदर्शन से जुड़े विभिन्न घटनाक्रम दिखाए गए। बाद में ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए।
हाल के दिनों में जंतर-मंतर सहित अन्य स्थानों पर हुई हिरासत की घटनाओं के दौरान भी कुछ लोगों ने खुद को पत्रकार बताते हुए अपना काम करने से रोके जाने की बात कही। अधिकारियों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि बड़ी संख्या में इन्फ्लुएंसर्स के पत्रकार होने का दावा करने से वास्तविक पत्रकारों के कामकाज और उनकी पहचान को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
पत्रकारों की पहचान के लिए क्या हो सकते हैं मानक?
सरकारी स्तर पर जिन संभावित मानकों पर विचार किया जा रहा है, उनमें पत्रकारिता को आय का प्रमुख स्रोत होना, संबंधित यूट्यूब चैनल या डिजिटल पोर्टल का नियमित रूप से समाचार और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय होना तथा सोशल मीडिया पर एक निश्चित स्तर तक दर्शकों की पहुंच या फॉलोअर्स होना शामिल है।
एक प्रस्ताव के तहत डिजिटल माध्यमों में पत्रकारिता से जुड़े लोगों को मान्यता देने के लिए भी स्पष्ट मानदंड बनाए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि किन लोगों को पत्रकारों के रूप में मिलने वाली अतिरिक्त सुविधाएं और विशेष पहुंच प्रदान की जानी चाहिए।
हालांकि, अभी इन प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और न ही किसी नए नियम की आधिकारिक घोषणा की गई है।
नागरिक अधिकार और पत्रकारों की विशेष सुविधाओं में अंतर
सूत्रों के अनुसार, प्रत्येक नागरिक को कानून के तहत अपने बुनियादी अधिकार प्राप्त हैं। हालांकि, किसी स्थान पर जाने, वहां वीडियो बनाने या कुछ गतिविधियों को रिकॉर्ड करने पर कानून के अनुसार प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सरकार के स्तर पर यह विचार किया जा रहा है कि पत्रकारों को उनके पेशे के कारण मिलने वाली अतिरिक्त पहुंच और सुविधाएं केवल निर्धारित मानदंडों के तहत मान्यता प्राप्त पत्रकारों तक सीमित रखी जाएं।
वायरल रील्स ने बढ़ाई सरकार की चिंता
अधिकारियों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में वायरल हो रही रील्स ने विरोध प्रदर्शनों की तस्वीर को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया। कई वीडियो के कारण सरकार के खिलाफ व्यापक जनआक्रोश होने की धारणा बनी। वहीं, कुछ वीडियो में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की सख्त कार्रवाई भी दिखाई गई।
प्रदर्शनों के दौरान युवाओं की अभद्र भाषा वाले वीडियो भी चर्चा में आए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विरोध प्रदर्शनों के बाद जारी अपने एक वीडियो में इस मुद्दे का उल्लेख किया था।
सूत्रों का दावा है कि छात्र प्रदर्शनकारियों और इन्फ्लुएंसर्स द्वारा प्रसारित वीडियो से सरकार की विरोध प्रदर्शनों से निपटने की रणनीति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नकारात्मक धारणा बनी। सोशल मीडिया पर वीडियो की बढ़ती पहुंच ने पारंपरिक टेलीविजन मीडिया की भूमिका को भी प्रभावित किया।
डिजिटल पत्रकारिता के सामने नई चुनौती
सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच पत्रकारिता और कंटेंट क्रिएशन के बीच अंतर तय करना सरकार के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित मानक किस प्रकार तैयार किए जाते हैं और उनका डिजिटल मीडिया, स्वतंत्र पत्रकारों तथा सोशल मीडिया पर समाचार साझा करने वाले लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
फिलहाल, इस मुद्दे पर चर्चा शुरुआती दौर में है। किसी भी संभावित बदलाव को लेकर अंतिम स्थिति सरकारी निर्णय और आधिकारिक दिशा-निर्देश जारी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
