गढ़वा से विकास कुमार की रिपोर्ट
कॉफ़ी विद एसडीएम" पर्यावरण विचारकों के साथ जल-संकट पर हुयी सार्थक परिचर्चा
विश्व जल दिवस पर गढ़वा की स्थानीय चुनौतियां पर हुआ मंथन, आये सुझाव
जल संरक्षण विकल्प नहीं अनिवार्यता है : एसडीएम
गढ़वा। सदर एसडीएम संजय कुमार के साप्ताहिक संवाद कार्यक्रम "कॉफी विद एसडीएम" की विशेष कड़ी के रूप में आज गढ़वा के पर्यावरण प्रेमियों और विचारकों को कॉफी पर आमंत्रित किया गया था। अनुमंडल कार्यालय सभागार में विश्व जल दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम के तहत गढ़वा के परिपेक्ष्य में जल संरक्षण विषय पर एक विचारोत्तेजक एवं उपयोगी विचार मंथन किया गया। अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार ने बताया कि सामान्यतया यह कार्यक्रम हर बुधवार को होता है किंतु इस बुधवार निकाय के निर्वाचित प्रतिनिधियों के शपथ ग्रहण के चलते उक्त कार्यक्रम बुधवार को नहीं हो पाया था।
स्थानीय जल संकट पर आए कई सुझाव और विचार
इस कॉफी संवाद के अवसर पर विभिन्न पर्यावरण प्रेमियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों एवं जागरूक नागरिकों ने भाग लिया और जल संरक्षण से जुड़े अपने अनुभव, सुझाव एवं स्थानीय समस्याओं को साझा किया। इस विचार मंथन का संचालन पर्यावरण विचारक नितिन तिवारी ने किया। मनोज द्विवेदी ने कहा कि आज कंक्रीट के जंगलों ने जल संकट को बढ़ाया है, इस संकट से उबरने के लिए जो प्रयास किया जा रहे हैं उनमें महिलाओं की भी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। पर्यावरण परिवार के संरक्षक विनोद पाठक ने कहा कि हमारे पुराणों में पानी को देवता माना जाता है और वरुण के रूप में पूजा होती है किंतु आज किसी भी जल यात्रा में गांव के निकट पानी नहीं मिलता है, बहुत दूर जाना पड़ता है। उन्होंने गढ़वा में सामूहिक सहयोग से जल संरक्षण जागरूकता अभियान चलाने की पेशकश की।
मनोज पाठक ने कहा कि प्रकृति सभी को पोषित करती है। प्रकृति पेड़ों को भी पानी देती है और जंतुओं को भी। समाज में भी पानी का न्याय संगत वितरण जरूरी है, इस कार्य में समाज और प्रशासन की संयुक्त भूमिका कारगर साबित हो सकती है।
आनंद पांडेय और दिवाकर तिवारी ने कहा कि स्कूली बच्चों के साथ-साथ सभी वर्गों के बीच जल संरक्षण को लेकर जागरूकता कार्यक्रम चलना चाहिए।
विपिन तिवारी ने कहा कि हम जल स्रोतों को नुकसान पहुंचा कर अपनी ही जड़ें नष्ट कर रहे हैं, भौतिकता की होड़ में हम तथाकथित विकास के भ्रम में जी रहे हैं। पानी का अंधाधुंध दोहन अविलंब रोकना होगा। नगर परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष अनिल पांडे ने कहा कि पानी बचाने का कार्य एक संस्कारशील व्यक्ति ही कर सकता है, ऐसे संस्कारों को नई पीढ़ी के बीच प्रचारित किया जाना चाहिए। उन्होंने नगर परिषद क्षेत्र में जल संरक्षण से जुड़े कई मुद्दे उठाए। सुप्रीत केसरी बालाजी ने कहा कि पॉलिथीन का उपयोग भी जल स्तर नीचा करने में बड़ा कारण बन रही है, आज बाजार क्षेत्र में 400 फीट तक पानी नहीं मिल रहा है।
सरस्वतिया और दानरो को बचाने की गुहार
अनिमेष चौबे ने सरस्वतिया और दानरो नदी को अविरल बनाने की वकालत की। कमलेश सिंहा ने एक संस्मरण सुनाया कि किशोरावस्था में वे इसी सरस्वतीया नदी में डूबते-डूबते बचे थे, लोगों ने उन्हें बचा लिया था, आज इस नदी में एक फीट भी पानी नहीं है। इनके अलावा अमिताभ विशाल, गौतम ऋषि, आशीष कुमार, नवीन कुमार शुक्ला, ध्रुव राज, प्रवीण कुमार आदि ने इन दोनों नदियों को बचाने की भावुक अपील की।
शहर के तालाबों की स्थिति पर लोगों ने जताई सामूहिक चिंता
संवाद में मौजूद स्थानीय पर्यावरण चिंतकों ने रामबांध तालाब और इसके सहायक तालाबों के मिटते अस्तित्व पर गंभीर चिंता जताई। कई लोगों ने कहा कि वे वर्षों से इनमें नहाने और तैरने का काम करते आए हैं, उनको मिट्टी भरकर अतिक्रमण कर पक्का निर्माण किया जा रहा है। इस पर अनुमंडल पदाधिकारी ने लिखित में बात रखने को कहा ।
संजय कुमार ने कहा कि कार्यक्रम का उद्देश्य प्रशासन और समाज के बीच संवाद स्थापित करते हुए स्थानीय जल संकट के समाधान की दिशा में ठोस पहल करना था। एसडीएम ने कहा कि जल केवल एक वैकल्पिक संसाधन नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों का अनिवार्य अधिकार है। उन्होंने गढ़वा क्षेत्र में गिरते भूजल स्तर, गर्मी के मौसम में उत्पन्न होने वाली पेयजल समस्याओं तथा पारंपरिक जल स्रोतों कुएँ और तालाबों की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है।
जनभागीदारी से ही स्थायी समाधान
संवाद के दौरान वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने, पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन, जल स्रोतों की नियमित सफाई एवं संरक्षण तथा समाज में व्यापक जनजागरूकता फैलाने पर विशेष बल दिया गया। प्रतिभागियों ने भी अपने-अपने स्तर पर किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी और कई व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किए।
अनुमंडल पदाधिकारी ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं के माध्यम से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जल संरक्षण को जन-आंदोलन का रूप दें तथा छोटे-छोटे प्रयासों के माध्यम से बड़े बदलाव की दिशा में योगदान करें।
कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने जल संरक्षण के प्रति सामूहिक संकल्प लिया कि वे जल की एक-एक बूंद को बचाने एवं इसके संरक्षण हेतु निरंतर प्रयास करेंगे। साथ ही प्राप्त सुझावों को स्थानीय प्रशासन द्वारा कार्ययोजना में शामिल कर आवश्यक कार्रवाई किए जाने का आश्वासन दिया गया।
इस अवसर पर गढ़वा के लगभग दो दर्जन प्रबुद्ध व्यक्ति उपस्थित थे।
