भारतीय नववर्ष सृष्टि का नववर्ष है
: नीरज श्रीधर ‘स्वर्गीय’
भारतीय नववर्ष केवल तिथि परिवर्तन का सूचक नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि में नवजीवन के संचार का पावन पर्व है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होने वाला यह नववर्ष भारतीय संस्कृति, प्रकृति और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। यह वह कालखंड है जब प्रकृति अपने नवयौवन में प्रवेश करती है और समस्त चराचर जगत एक नई ऊर्जा, नई आशा और नई स्फूर्ति से परिपूर्ण हो उठता है।
भारतीय परंपरा के अनुसार इसी पावन दिन सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना का प्रारंभ किया था। इसलिए यह दिन केवल एक कालगणना का आरंभ नहीं, बल्कि सृष्टि के जन्म का प्रतीक भी है। इस दृष्टि से भारतीय नववर्ष को ‘सृष्टि का नववर्ष’ कहा जाना अत्यंत सार्थक है। जब हम इस दिन का स्वागत करते हैं, तब हम वस्तुतः उस सृजनात्मक शक्ति का अभिनंदन करते हैं, जिसने इस विश्व की रचना की और जीवन को गति प्रदान की।
प्रकृति भी इस नववर्ष के आगमन पर अपनी अनुपम छटा बिखेरती है। वृक्षों पर नवपल्लव प्रस्फुटित होते हैं, आम्र-मंजरियों की सुगंध वातावरण को महकाती है, खेतों में स्वर्णिम फसलें लहलहाती हैं और मधुर पवन जीवन में उल्लास भर देती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं प्रकृति नववर्ष का स्वागत कर रही हो। यह दृश्य केवल सौंदर्य का ही नहीं, बल्कि नवजीवन और पुनर्निर्माण का भी प्रतीक है। यही कारण है कि भारतीय नववर्ष को प्रकृति के नवजागरण का पर्व भी कहा जाता है।
भारतीय नववर्ष की विशेषता उसकी वैज्ञानिकता और प्रकृति के साथ उसकी गहन संगति में निहित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने गहन अध्ययन और अनुभूति के आधार पर इस कालखंड को वर्षारंभ के रूप में निर्धारित किया। यह समय न अत्यधिक ठंड का होता है और न ही तीव्र गर्मी का, बल्कि एक संतुलित और अनुकूल वातावरण प्रदान करता है। यह संतुलन जीवन के लिए भी आवश्यक है, क्योंकि यही संतुलन हमें मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से सुदृढ़ बनाता है। इस प्रकार भारतीय नववर्ष केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत सार्थक है।
यह नववर्ष आत्मचिंतन और आत्मसुधार का एक उत्कृष्ट अवसर भी प्रदान करता है। बीते हुए वर्ष की सफलताओं और असफलताओं का अवलोकन कर हम अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। यह समय हमें प्रेरित करता है कि हम अपने भीतर के अज्ञान, आलस्य और नकारात्मकता को त्यागकर ज्ञान, परिश्रम और सकारात्मकता को अपनाएं। यह केवल व्यक्तिगत विकास का ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान का भी संकल्प लेने का अवसर है।
भारतीय संस्कृति में यह नववर्ष विविध रूपों में मनाया जाता है। देश के विभिन्न भागों में इसे अलग-अलग नामों—जैसे उगादि, गुड़ी पड़वा, नवसंवत्सर आदि—से मनाया जाता है। यद्यपि नाम और परंपराएं भिन्न हैं, परंतु सभी का मूल भाव एक ही है—नवजीवन का स्वागत और सृजनात्मक ऊर्जा का उत्सव। यह हमारी सांस्कृतिक एकता और विविधता का अद्वितीय उदाहरण है, जो हमें यह सिखाता है कि भिन्नताओं के बावजूद हम एक ही सांस्कृतिक धारा से जुड़े हुए हैं।
भारतीय नववर्ष हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का भी संदेश देता है। आज के यांत्रिक और भौतिकवादी जीवन में मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। ऐसे समय में यह नववर्ष हमें स्मरण कराता है कि हमारा अस्तित्व प्रकृति से जुड़ा हुआ है और हमें उसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सजग रहना चाहिए।
अंततः, भारतीय नववर्ष केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि जीवन निरंतर परिवर्तन और नवसृजन की प्रक्रिया है। हमें प्रत्येक क्षण को एक नए अवसर के रूप में स्वीकार कर स्वयं को निरंतर नवीनीकृत करते रहना चाहिए। यही इस नववर्ष का वास्तविक संदेश है—नवचेतना, नवसृजन और नवप्रेरणा का संदेश।
आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि हम अपने जीवन में सकारात्मकता, सदाचार और सेवा की भावना को विकसित करेंगे तथा समाज और राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान देंगे। यही भारतीय नववर्ष की सच्ची सार्थकता है, और यही ‘सृष्टि के नववर्ष’ का वास्तविक उत्सव भी।
नीरज श्रीधर 'स्वर्गीय'
कला धरोहर संयोजक
संस्कार भारती झारखण्ड प्रांत
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निदेशक
पं. हर्ष द्विवेदी कला मंच
नवादा, गढ़वा (झारखण्ड)
