एक लोक स्वर जो थम गया : नीरज श्रीधर 'स्वर्गीय'
लोक गायकी के क्षेत्र में विशेष कर नारदी विधा के माध्यम से विशेष पहचान बनाने वाले गढ़वा जिले के एक ऐसे कलासाधक का नाम सम्मान के साथ लिया जाता रहा है जिन्हें लोग विक्रमा व्यास के नाम से जानते रहे। विक्रमा व्यास जी ने अपने पूरे जीवन काल में लोक गायन की विभिन्न विधाओं माध्यम से समाज को बहुत कुछ दिया। भजन-कीर्तन के साथ "दो गोला गायन" में भी उनके द्वारा कई कीर्तिमान स्थापित किए गए। लोककला की सेवा करते हुए विक्रमा व्यास जी ने अपने कई शिष्यों को भी लोक गायन की विधा में निपुण बनाने का कार्य किया। उन्हें कई अवसरों पर विभिन्न प्रकार के सम्मानों से सम्मानित भी किया गया।
कला एवं साहित्य की अखिल भारतीय संस्था संस्कार भारती की गढ़वा जिला इकाई द्वारा विक्रमा व्यास जी को बाबा बंशीधर की पावन नगरी में कला गुरु सम्मान से सम्मानित भी किया गया था।
आज विक्रम संवत् २०८२ के फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को लोक कलासाधक विक्रमा व्यास जी हम सब को छोड़कर गोलोक वासी हो गए। उनका यूँ जाना समस्त कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति तो है ही साथ में सभी कला साधक अत्यन्त मर्माहत हैं।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें यही हम कला साधकों की ओर से विशेष प्रार्थना है।
"नाम गुम जाएगा
चेहरा ये बदल जाएगा
मेरी आवाज ही मेरी पहचान है
ग़र याद रहे..."
नीरज श्रीधर 'स्वर्गीय'
कला धरोहर संयोजक
संस्कार भारती झारखण्ड प्रांत
