होली खेलने का आधुनिक ढंग इसकी पवित्रता और मान्यताओं को कम कर रहा है : पुरुषोत्तम
बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली का पर्व हिंदू धर्म का एक पावन और प्राचीन उत्सव है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, समरसता और सामाजिक एकता का संदेश देने वाला पर्व है। सदियों से इसकी पौराणिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक मान्यताएँ समाज को जोड़ती रही हैं। विभिन्न जाति, वर्ग और परंपराओं के लोग भेदभाव भुलाकर इस उत्सव को हर्षोल्लास के साथ मनाते आए हैं।
किन्तु बदलते समय के साथ होली के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन आया है। आधुनिकता के प्रभाव में रंगों की विविधता तो बढ़ी है, परंतु मर्यादा और पवित्रता में कमी दिखाई देने लगी है। पहले लोग अबीर-गुलाल लगाकर बड़ों का आशीर्वाद लेते थे और शालीन वातावरण में उत्सव मनाते थे। गीत-संगीत में लोक संस्कृति की मिठास और भक्ति का भाव होता था। आज अनेक स्थानों पर अश्लील गीतों, फूहड़ता और नशे की प्रवृत्ति ने त्योहार की गरिमा को प्रभावित किया है।
कपड़े फाड़ना, कीचड़ में लोटाना, जबरन रंग लगाना या अमर्यादित व्यवहार करना होली की परंपरा नहीं है। ऐसे कृत्य समाज के एक वर्ग को असहज कर देते हैं और कई लोग घरों में ही सीमित रहने को विवश हो जाते हैं। यह स्थिति चिंता का विषय है, क्योंकि होली का मूल उद्देश्य प्रेम और सौहार्द बढ़ाना है, न कि भय या असुविधा उत्पन्न करना।
फिर भी देश के कुछ पवित्र स्थलों पर आज भी होली की पारंपरिक गरिमा अक्षुण्ण है। वृंदावन और मथुरा में भक्ति-भाव से परिपूर्ण होली विश्वविख्यात है, जहाँ श्रद्धालु आध्यात्मिक वातावरण में रंगों का आनंद लेते हैं। इसी प्रकार काशी में भी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं के अनुरूप उत्सव मनाया जाता है।
आवश्यक है कि हम इन परंपराओं से प्रेरणा लें और होली की पवित्रता को पुनर्स्थापित करने का संकल्प करें। अश्लीलता, अभद्रता और नशे से दूर रहकर यदि हम शालीन एवं सौहार्दपूर्ण तरीके से होली मनाएँ, तो यह पर्व पुनः अपनी वास्तविक गरिमा प्राप्त कर सकता है। हमारी संस्कृति और परंपरा की रक्षा करना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।
पुरुषोत्तम सिंह चंदेल
अध्यक्ष
श्रीजानकी बाग पूजा समिति
नवादा, गढ़वा
