होली केवल रंग खेलने का अवसर नहीं, बल्कि मन के भेद मिटाने और संबंधों को सुदृढ़ करने का उत्सव है- रिया Garhwa

समानता, मर्यादा और सुरक्षा का पुनर्स्मरण
होली भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत प्राचीन और जीवंत पर्व है, जो रंगों, उमंग और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। यह केवल रंग खेलने का अवसर नहीं, बल्कि मन के भेद मिटाने और संबंधों को सुदृढ़ करने का उत्सव है। परंपरागत रूप से होली समाज में व्याप्त ऊँच-नीच, जाति-पाँति और वर्गभेद की दीवारों को तोड़ने का माध्यम रही है। रंगों की समानता इस बात का प्रतीक है कि हम सभी एक ही मानव परिवार के सदस्य हैं।
इस पर्व का आरंभ होलिका दहन से होता है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह हमें स्मरण कराता है कि अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है, जबकि सत्य और सद्भाव अंततः विजयी होते हैं। अगले दिन रंगोत्सव में लोग गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे के गले मिलते हैं। गाँवों और कस्बों में सामूहिक होली की परंपरा सामाजिक एकता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है।
किन्तु समय के साथ इस पावन पर्व के स्वरूप में कुछ विकृतियाँ भी देखने को मिलती हैं। कहीं-कहीं जबरन रंग लगाना, नशे का दुरुपयोग और अभद्र व्यवहार जैसी घटनाएँ उत्सव की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं। विशेषकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। “बुरा न मानो होली है” जैसे वाक्यों का दुरुपयोग कर मर्यादा का उल्लंघन करना हमारी संस्कृति के मूल भाव के विपरीत है।
भारतीय परंपरा में नारी को सम्मान और शक्ति का प्रतीक माना गया है। “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” का संदेश हमें याद दिलाता है कि जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है। अतः होली का वास्तविक स्वरूप तभी सुरक्षित रहेगा, जब उसमें सहमति, मर्यादा और परस्पर सम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया जाएगा।
आज आवश्यकता है कि हम होली को केवल बाहरी रंगों तक सीमित न रखें, बल्कि अपने विचारों और व्यवहार को भी सकारात्मक रंगों से सजाएँ। यदि समाज मिलकर यह संकल्प ले कि उत्सव में किसी भी प्रकार की जबरदस्ती या असम्मान को स्थान नहीं दिया जाएगा, तो होली पुनः अपनी मूल पहचान प्राप्त कर सकती है। तभी यह पर्व सच्चे अर्थों में समानता, सुरक्षा और संस्कारों का प्रतीक बन सकेगा।
रिया राशि
कला साधिका
पंडित हर्ष द्विवेदी कला मंच
नवादा, गढ़वा

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