होली का आगमन केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का उत्सव- नीरज श्रीधर 'स्वर्गीय' Garhwa

समरसता, संस्कृति और सद्भाव का उत्सव
“ए जजमानी तोरा सोने के केवाड़ी, दुगो लकड़ी दऽs, दु गो गोइठा दऽs…”—यह स्वर केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि भारतीय ग्राम्य जीवन की आत्मा का संगीत है। 
फाल्गुन की मादक बयार के साथ जब प्रकृति रंगों से भर उठती है, तब होली का आगमन केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का उत्सव बन जाता है। गाँवों में बच्चे, युवा और बुजुर्ग घर-घर जाकर होलिका दहन के लिए लकड़ी और उपले एकत्र करते थे। यह परंपरा सहयोग, अपनत्व और सामाजिक समरसता की जीवंत मिसाल थी।
होलिका दहन की अग्नि हमें भक्त प्रह्लाद की अटूट आस्था और बुराई पर अच्छाई की विजय की याद दिलाती है। यह अग्नि केवल लकड़ियों को नहीं जलाती, बल्कि हमारे भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और कटुता को भी भस्म करने का संदेश देती है। अग्नि की परिक्रमा करते हुए नई फसल की बालियाँ सेंकना और समृद्धि की कामना करना प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। अगले दिन धूलेंडी पर अबीर-गुलाल से खेली जाने वाली स्नेहिल होली सामाजिक भेदभाव को मिटाकर सबको एक रंग में रंग देती है।
परंतु आधुनिकता और बाज़ारवाद के प्रभाव से होली के स्वरूप में परिवर्तन आया है। रासायनिक रंगों का उपयोग, फूहड़ गीतों और नशे की प्रवृत्ति ने इस पावन पर्व की गरिमा को प्रभावित किया है। इससे न केवल स्वास्थ्य और पर्यावरण को हानि पहुँचती है, बल्कि सामाजिक सौहार्द भी आहत होता है।
आज आवश्यकता है कि हम होली को उसके मूल स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित करें। प्राकृतिक रंगों—हल्दी, चंदन, फूलों और गुलाल—का प्रयोग करें तथा पारंपरिक फाग और लोकगीतों को बढ़ावा दें। सामूहिक भजन-कीर्तन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और लोकनृत्य के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ा जा सकता है।
होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि मन के परिष्कार का उत्सव है। क्षमा, प्रेम और भाईचारे का संदेश ही इसकी आत्मा है। यदि हम इस पारंपरिक स्वर को पुनर्जीवित कर सकें, तो होली पुनः समरसता और सद्भाव की उज्ज्वल पहचान बनकर समाज को आलोकित करेगी।
✍️
नीरज श्रीधर 'स्वर्गीय'
कला धरोहर संयोजक, संस्कार भारती झारखंड प्रांत
निदेशक, पंडित हर्ष द्विवेदी कला मंच
नवादा, गढ़वा

Latest News

बिशुनपुर नवादा मोड़ में रामनवमी पूजा महोत्सव 2026 की तैयारी शुरू, कमिटी का गठन Garhwa