भारतीय नववर्ष के आगमन के साथ ही प्रकृति का स्वरूप निखर जाता है : संध्या सुमन
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा भारतीय संस्कृति में नववर्ष के रूप में अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि नवजीवन, नवसंकल्प और नवचेतना का प्रतीक है। जैसे ही यह पावन दिन आता है, प्रकृति भी अपने नवीन रूप में सजीव हो उठती है। वृक्षों पर नई कोपलें खिलती हैं, पुष्पों की सुगंध वातावरण को सुरभित करती है और चारों ओर हरियाली का अद्भुत दृश्य मन को आनंदित कर देता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का शुभारंभ किया था, जिससे यह दिवस सृजन और आरंभ का प्रतीक बन गया। इसी पावन अवसर पर प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक भी हुआ था, जो धर्म, मर्यादा और आदर्श शासन की स्थापना का संदेश देता है। साथ ही, आर्य समाज की स्थापना भी इसी दिन हुई, जिसने समाज में नवजागरण, सुधार और वैदिक मूल्यों के पुनर्स्थापन का कार्य किया।
भारतीय नववर्ष का यह पर्व हमारी परंपराओं और आचार-विचार में भी स्पष्ट रूप से झलकता है। इस दिन प्रातःकाल उठकर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करना और उनकी आरती उतारना अत्यंत शुभ माना जाता है। सूर्यदेव समस्त सृष्टि के जीवनदाता हैं, अतः उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है।
घर-आंगन को स्वच्छ कर सुंदर रंगोली बनाई जाती है, जो सुख-समृद्धि और मंगल का प्रतीक होती है। रसोई में विभिन्न प्रकार के मधुर व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जो परिवार में प्रेम और उल्लास को बढ़ाते हैं। रात्रि के समय दीपमालिका से घरों और मंदिरों को सजाया जाता है, जिससे वातावरण प्रकाशमय और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता है।
इस अवसर का सबसे सुंदर पक्ष है—आपसी स्नेह और शुभकामनाओं का आदान-प्रदान। लोग एक-दूसरे को भारतीय नववर्ष की बधाइयाँ देते हैं और सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना करते हैं।
भारतीय नववर्ष हमें अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते हुए नए उत्साह के साथ जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। आइए, इस नववर्ष पर हम सभी सकारात्मक सोच, उत्तम कर्म और उच्च आदर्शों के साथ एक नए युग का स्वागत करें।
संध्या सुमन
कला साधिका
पं. हर्ष द्विवेदी कला मंच
नवादा, गढ़वा (झारखण्ड)
